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OM Symbol Meaning - Aum Ka Matlab – OM Ka Arth Hindi

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ओउम् अंग्रेजी का शब्द ‘‘omni”, जिसके अर्थ अनेक और कभी खत्म न होने वाले तत्वों पर लगाये जाते हैं। जैसे omnipresent (सर्वशक्तिमान) omnipotent (सर्वभूत या परमेश्वर) वास्तव में इस ओउम् शब्द से ही बना है। इतने से यह सिद्ध है कि ओउम् किसी मत, मजहब या सम्प्रदाय से न होकर बल्कि पूरी इंसानियत का है। ठीक उस प्रकार जैसे पानी, हवा, सूर्य, ईश्वर, वेद आदि सब पूरी इंसानियत के लिये हैं, न कि केवल किसी एक सम्प्रदाय के लिये। अब प्रश्न यह है कि यदि ‘ओउम् ’एक दिव्य ध्वनि है तो इसका उद्गम क्या है ? यदि ब्रह्माण्ड में कतिपय ध्वनि तरंगे व्याप्त अर्थात् विद्यमान हैं। तो इनका कारक क्या है, क्योंकि यह तो विज्ञान का नियम है कि कोई भी ध्वनि स्वतः उत्पन्न नहीं होती। जहां कोई हरकत होगी, वहीं ध्वनि उत्पन्न होगी। फिर चाहे वह कानों से सुनाई दे या नहीं। संस्कृत में ओउम् शब्द तीन अक्षरों से बना है : ‘‘अ”, ‘‘उ” और ‘‘म”। जब ‘अ’ और ‘उ’ को जोड़ा जाता है, तो यह मिलकर ‘‘ओ” अक्षर बन जाता है। यदि आप क्रमशः ‘अ’ और ‘उ’को बार-बार दोहराते रहेगें तो आप पायेंगे कि इस मिश्रण का परिणाम स्वरूप ध्वनि ‘‘ओ” स्वाभाविक रूप से आती है। इसके बाद आखिरी अक्षर ‘‘म” कहा जाता है। ‘अ’ ध्वनि गले के पीछे से निकलती है, यह पहली ध्वनि है जो सभी मनुष्यों द्वारा मुँह खोलते ही निकलती है। इसके बाद ध्वनि ‘उ’ आती है जो तब निकलती है जब मुँह एक पूरी तरह से खुले होने से अगली स्थिति में आता है। ध्वनि ‘म’ का गठन होता है जब होठों को जोड़ते हैं और मुँह पूरी तरह बंद हो जाता है इसीलिये यह अंत का प्रतीक है। जब इन ध्वनियों को एक साथ जोड़ दिया जाता है यह ओउम् का अर्थ है। शुरूआत, मध्य और अंत। ‘‘संक्षेप में, सभी ध्वनियां, चाहे वह कितनी अलग हों या किसी भी भाषा में बोली जाती हों, ये सभी इन तीनों की सीमा के अन्दर आती हैं। ओउम् की कई अन्य व्याख्याएं भी हैं, जिनमें से कुछ निम्न हैं :-

अ = तमस (अंधकार, अज्ञान), उ = रजस (जुनून, गतिशीलता), म = सत्व (शुद्धता, प्रकाश)

अ = ब्रह्मा (निर्माता), उ = विष्णु (परिरक्षक), म = शिव (विध्वसंक)

अ = तमस (अंधकार, अज्ञान), उ = रजस (जुनून, गतिशीलता), म = सत्व (शुद्धता, प्रकाश)

इसके अलावा गायत्री मन्त्र के अर्थ में कहा गया है कि हमारा पृथ्वी मंडल, गृह मंडल, अंतरिक्ष मंडल तथा सभी आकाश गंगाओं की गतिशीलता से उत्पन्न महान शोर ही ईश्वर की प्रथम पहचान प्रणव अक्षर ‘ओउम् ’है। चलिये देख लेते हैं कि ॐ तथा गायत्री मंत्र का पूर्ण अर्थ क्या है ?

(अ) नाम की खोज (ॐ) ओउम् प्रणव अक्षर :-

भूः= भू मंडल, भू-लोक

भुवः= अंतरिक्ष लोक, गृह मंडल

स्वः= स्वर्ग लोक

(ब)रूप की खोज - तत - वह परमात्मा :-

तत् = वह परमात्मा

सवित = ईश्वर

वरेण्यम् = वंदना करने योग्य

(स) उपासना - भर्गो - तेज का, प्रकाश का

देवस्य = देवताओं का

धीमहि = ध्यान करते हैं

(द) धियो - बुद्धि

यो = जो कि

नः = हमारी

प्रचोदयात - सन्मार्ग पर प्रेरित करें।

उपरोक्त गायत्री मंत्र के अर्थ में कहा गया है कि हमारा पृथ्वी मण्डल, गृह मण्डल, अंतरिक्ष मण्डल व सभी आकाश गंगाओं की गतिशीलता से उत्पन्न महान शोर ही ईश्वर की प्रथम पहचान प्रणव अक्षर ‘ओउम् ’ है और वह परमात्मा जो विभिन्न रूप प्रकाश के रूप में प्रकट है उस परमात्मा के प्रकाश का हम ध्यान करें और यह प्रार्थना करें कि वह हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर लगाये रखे ताकि सद्बुद्धि हमारे चंचल मन को नियंत्रण में रख सके और साधक को ब्रह्म की अनुभूति करा सके। विभिन्न ग्रहों की गतिशीलता से उत्पन्न ध्वनियां ही हमें निरन्तर इस बात का एहसास कराती हैं कि प्रत्येक गृह अपनी धुरी पर, सूर्य के चारों ओर एक निश्चित गति से लगातार चक्कर लगाते रहते हैं जिनसे यह अनंत ब्रह्माण्ड अनंत काल से गतिशील है। भौतिक नियमो के अन्तर्गत पृथ्वी की गतिशीलता से दिन-रात व ऋतुओं में परिवर्तन आदि होता है। ग्रहों की गतिशीलता से उत्पन्न यह ध्वनि तरंगें जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड में सदा व्याप्त रहती हैं, सृष्टि की निरंतरता का हमें बोध कराती हैं तथा इन्हीं से सृष्टि का निर्माण एवं सृजन होता है।